स्वाभिमान से कभी समझौता नहीं किया प्रभाकर श्रोत्रिय ने : डॉक्टर उर्मिला शिरीष
भोपाल :
वरिष्ठ साहित्यकार स्व. डॉ. प्रभाकर श्रोत्रिय की स्मृति में दुष्यंत कुमार स्मारक पांडुलिपि संग्रहालय में मंगलवार की शाम ‘स्मरण प्रभाकर’ कार्यक्रम आयोजित किया गया। साहित्यकारों ने उनके व्यक्तित्व, आलोचना-कर्म और साहित्यिक योगदान को याद करते हुए उन्हें स्वतंत्रचेता, स्वाभिमानी और संवेदनशील साहित्यकार बताया।
कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ लेखिका डॉ. उर्मिला शिरीष ने की। डॉ. प्रभु दयाल मिश्र और डॉ. रेखा कस्तवार ने डॉ. श्रोत्रिय से जुड़ी स्मृतियां साझा कीं। संयोजन निरंजन श्रोत्रिय ने किया, जबकि संचालन डॉ. विशाखा राजुरकर राज ने किया। दीप प्रज्वलन के साथ कार्यक्रम का शुभारंभ हुआ। संग्रहालय की निदेशक करुणा राजुरकर ने अतिथियों का स्वागत किया। डॉ. श्रोत्रिय की पत्नी ज्योतिवाला श्रोत्रिय भी उपस्थित रहीं।
संग्रहालय की निदेशक करुणा राजुरकर ने कहा कि डॉ. श्रोत्रिय से उनके पारिवारिक संबंध रहे हैं। उनके साथ जुड़ी अनेक स्मृतियां हैं, जिन्हें शब्दों में समेटना कठिन है। उन्होंने उनकी सहजता और आत्मीयता से जुड़ी स्मृतियां साझा करते हुए कहा कि मुझे कागज में पिन लगाने का तरीका श्रोत्रिय जी ने बताया।
मुख्य वक्ता और डॉ. श्रोत्रिय के भतीजे निरंजन श्रोत्रिय ने कहा कि परिवार में भी उनका स्वाभिमान कायम रहा और साहित्य में भी। उन्होंने लेखकों के हित में महत्वपूर्ण काम किया और उन्हें भरपूर रॉयल्टी दिलाने के प्रयास किए। आलोचना के क्षेत्र में उनका उल्लेखनीय योगदान रहा। वे किसी राजनीतिक संगठन या विचारधारा के झंडाबरदार नहीं बने। सभी विचारधाराओं के लोगों के प्रति उनके मन में समान सम्मान था। युवा पीढ़ी के प्रति भी वे बेहद संवेदनशील थे। उन्होंने बताया कि जूरी सदस्य के रूप में चंद्रकांत देवताले को अकादमी पुरस्कार दिलाने में भी डॉ. श्रोत्रिय की महत्वपूर्ण भूमिका रही।
वरिष्ठ लेखिका डॉ. रेखा कस्तवार ने कहा कि उनकी एमए की पढ़ाई में डॉ. श्रोत्रिय का महत्वपूर्ण योगदान रहा। एक शिक्षक के रूप में उन्होंने विद्यार्थियों को गढ़ा। परंपरा और आधुनिकता को वे साथ लेकर चलते थे। उन्होंने कहा कि शिक्षक का प्रभाव जब शिष्य की चेतना का हिस्सा बन जाए, तो वह लंबे समय तक बना रहता है। डॉ. श्रोत्रिय इसका जीवंत उदाहरण थे। उनकी साहित्यिक विरासत को सहेजना आज की पीढ़ी का दायित्व है।
डॉ. प्रभु दयाल मिश्र ने डॉ. श्रोत्रिय के आलोचनात्मक चिंतन को रेखांकित करते हुए कहा कि उन्होंने काव्य और नाटक के संबंध को लेकर महत्वपूर्ण सवाल उठाए। काव्य में नाटक निहित है या नाटक में काव्य—इस बहस में उन्होंने प्रचलित मान्यताओं का प्रतिवाद किया। उनके आलोचनात्मक विवेक और मौलिक दृष्टि ने साहित्यिक विमर्श को नई दिशा दी।
अध्यक्षीय उद्बोधन में डॉ. उर्मिला शिरीष ने कहा कि करुणा राजुरकर ने डॉ. प्रभाकर श्रोत्रिय की स्मृति में महत्वपूर्ण आयोजन किया है। उन्होंने कहा कि शिक्षक का प्रभाव अपने शिष्य के मन पर कितना गहरा होता है, यह आज यहां स्पष्ट दिखाई दे रहा है। डॉ. शिरीष ने कहा, “प्रभाकर श्रोत्रिय का व्यक्तित्व स्वच्छ और धवल था। उन्होंने कभी अपने स्वाभिमान से समझौता नहीं किया। उनका व्यक्तित्व और साहित्यिक अवदान लंबे समय तक स्मरण किया जाता रहेगा।”
कार्यक्रम के अंत में संग्रहालय के अध्यक्ष डॉ रामराव बामनकर ने आभार व्यक्त किया गया। आयोजन में बड़ी संख्या में लेखक, साहित्यकार, पत्रकार और साहित्यप्रेमी उपस्थित रहे।

