संस्कृत और अरबी के विद्वानों से करवाया राष्ट्रगीत का अनुवाद अब मुस्लिमों के बीच भी पहुंच रहा वंदे मातरम्

भोपाल। कुछ बरस पहले जब स्कूलों और मदरसों में वंदे मातरम गान की अनिवार्यता की बातें उठीं, सरकारी संस्थानों और खासकर मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्रों में इसके गाने पर जोर दिया जाने लगा तो समाज दो धड़ों में बंटता दिखाई देने लगा। जहां हिन्दूवादी विचारधारा के लोगों ने इस फैसले का स्वागत किया, वहीं मुस्लिम समाज इससे खुद को अलग करता दिखाई देने लगा। दोनों के अपने-अपने विचार, अलग-अलग तर्क थे। मामलात बिगड़ने लगे तो मुस्लिम समाज से एक आवाज आई। उसने जिम्मेदारी उठाई कि मुस्लिम समाज में वंदे मातरम को लेकर फैली भ्रांतियों को दूर किया जाए। संस्कृत और अरबी के विद्वानों से इस गीत का अनुवाद करवाया गया। अब इसे लेकर समाज के बीच पहुंचा जा रहा है। गीत के अनुवाद और उसके मूल मकसद की बारीकियां लोगों को समझाई जा रही हैं। पिछले कई सालों से चल रहे इस काम के बीच कहीं विरोध तो कहीं सहमति के मिले-जुले असर भी दिखाई दे रहे हैं। मुस्लिम समाज के बीच वंदे मातरम का तजुर्मा (अनुवाद) लेकर पहुंचने की शुरूआत मुस्लिम राष्ट्रीय मंच के सह-संयोजक एसके मुद्दीन ने की है।
करीब पांच-छह साल पहले जब मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने सभी स्कूलों और शैक्षणिक संस्थाओं में वंदे मातरम गान की अनिवार्यता लागू की तो प्रदेश सहित देशभर के मदरसों ने खुद को इससे अलग कर लिया था। चूंकि मदरसा स्कूली शिक्षा के अंतर्गत आते हैं और इनको मानव संसाधन विकास मंत्रालय से मदद मिलती है, इसके चलते यह अनिवार्यता मदरसों पर भी लागू होती है। ऐसे में तात्कालीन मप्र मदरसा बोर्ड अध्यक्ष एसके मुद्दीन ने वंदे मातरम का तजुर्मा कराया और वंदे मातरम गीत को लेकर मुस्लिम समाज में फैली भ्रांतियों को दूर करने का बीड़ा उठाया है।

मकसद सामाजिक एकरसता का
जहां हिन्दुत्व को एक जात और धर्म विशेष से जोड़कर देखा जाता है, वहीं एसके मुद्दीन इसे महज एक जीवनशैली मानते हैं। उनका मानना है कि इन्सान जिस देश या जमीन पर रहता है या वास करता है, उसकी एक जीवनशैली होती है, जिसका वह पालन करता है। भारत में रहने वालों की तेहजीब हिन्दू सभ्यता है और इसी वजह से वह हिन्दू सभ्यता और हिन्दुत्व से जुड़े हैं। उनकी तकरीरों में रामराज को किसी धार्मिक या सियासी नारे के रूप में इस्तेमाल किए जाने का विरोध भी होता है। उनका कहना है कि आजादी के पहले जब महात्मा गांधी रामराज की कल्पना किया करते थे, भूखे को खाना, सिर पर छत और तन ढकने को कपड़ा ही उन्होंने रामराज का आधार माना था। उनके रामराज की कल्पना में बेहतर इंसाफ और दुश्मन के प्रति भी मयार्दाओं का पालन करना शामिल होता था।

विरोध भी सहमति भी
पुरे देश सहित प्रदेशभर में दिखाए जा रहे वंदे मातरम के तर्जुमे को लेकर मुस्लिम समाज में अलग-अलग तरह की प्रतिक्रियाए हैं। जहां राष्ट्रीय मुस्लिम मंच और भाजपा से जुड़े मुस्लिम इससे संतुष्ट दिखाई दे रहे हैं तो वहीं पुख्ता ईमान और एकेश्वरवाद की बात पर कायम मुस्लिमों को इस पर ऐतराज है। उनका कहना है कि शब्दों के हेरफेर से भावनाएं नहीं बदल सकती, झूठ को सच करार नहीं दिया जा सकता। इस्लाम में खुदा के सिवा किसी किसी की इबादत या सजदा करना जायज नहीं है।

यह हैं एसके मुद्दीन
भाजपा के पुराने कार्यकर्ता हैं। प्रदेश से लेकर राष्ट्रीय स्तर की कार्यकारिणियों में उनकी मौजूदगी है। भाजपा अल्पसंख्यक मोर्चा की राजनीति से जुड़े मुद्दीन मप्र मदरसा बोर्ड के चेयरमेन रह चुके हैं। वे कुक्कुट विकास निगम के उपाध्यक्ष भी रह चुके हैं। साथ ही आरएसएस की मुस्लिम विग राष्ट्रीय मुस्लिम मंच के वे राष्ट्रीय सह-संयोजक भी है। वे राज्य अल्पसंख्यक एवं पिछड़ा वर्ग वित्त विकास निगम के उपाध्यक्ष के भी रहे हैं।

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यह है वंदे मारतम् का अनुवाद

वंदे मातरम् वंदे मातरम्
(ऐ मादरे वतन तुझे मेरा सलाम)

सुजलाम सुफलाम मायज शीतलाम
(जिसका पानी अच्छा है, फल अच्छे हैं, चंदन की ठण्डी हवाएं हैं)

शस्य शंयामालाम भारतम्। वंदे मातरम्।
(उपजाउ यहां की जमीन है। ऐ मादरे वतन तुझे मेरा सलाम)

शुभ्रज्योत्स्नाम पुलकित यामीनिम।
(सुहानी चांदनी, दिल को सुकून देने वाली रातें)

फुल्ल कुसमित द्रुमदल शोभिनीम।।
(खिले हुए फूल, पेड़ के जमघट बहुत अच्छे हैं) सुहासिनी सुमधुरभाषिणीम। (प्यारी मुस्कान और मीठे बोल हैं तेरे) सुखदाम वरदाम् मातरम्। वंदे मारतम् ।।
(सुख देने वाली हमें दुआ दे। ऐ मादरे वतन तुझे मेरा सलाम
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इनका कहना है
इस्लाम में अल्लाह के सिवा किसी की इबादत जायज नहीं है। अल्फाजों को बदलकर उनकी भावनाओं को नहीं बदला जा सकता।
– काजी सैयद मुश्ताक अली नदवी, काजी-ए-शहर

वंदे मातरम धार्मिक या सामाजिक बहस का मुद्दा नहीं है। यह साहित्यिक बहस है, जिसे सियासी पार्टियों ने साम्प्रदायिक रंग चढ़ा दिया है।

* काजी सैयद अनस अली नदवी, अध्यक्ष, ऑल इण्डिया उलेमा बोर्ड

प्रख्यात पण्डितों और अरबी के विद्वानों से अनुवाद कराया गया है। इस गीत में देश की जमीन, पानी, फल, फूल, पौधों, चांदनी आदि की तारीफ की गई है। जिस देश या जमीन पर इंसान सांसें ले रहा है उसकी तारीफ करने का हुक्म इस्लाम भी देता है।