गृहणी से बैंक सखी तक: प्रेमलता नरवरिया ने आत्मनिर्भरता से लिखा नया अध्याय

भोपाल:

स्वयं सहायता समूह और प्रशिक्षण ने बदली जिंदगी, आज गाँव-गाँव पहुँचा रहीं बैंकिंग सुविधाएँ

बैरसिया तहसील के छोटे से ग्राम गुनगा की रहने वाली प्रेमलता नरवरिया की कहानी ग्रामीण महिला सशक्तिकरण, आत्मविश्वास और आत्मनिर्भरता की एक प्रेरक मिसाल है। कभी घर-परिवार की जिम्मेदारियों तक सीमित रहने वाली प्रेमलता आज अपने गाँव और आसपास के क्षेत्रों में “बैंक सखी” के रूप में पहचान बना चुकी हैं। उनके जीवन का यह बदलाव न केवल उनके परिवार की आर्थिक स्थिति को मजबूत कर रहा है, बल्कि अनेक ग्रामीण महिलाओं को भी नए सपने देखने और उन्हें साकार करने की प्रेरणा दे रहा है।

प्रेमलता नरवरिया ने अपने जीवन में बदलाव की शुरुआत “गुनगा स्वयं सहायता समूह” से जुड़कर की। समूह ने उन्हें केवल आर्थिक गतिविधियों से ही नहीं जोड़ा, बल्कि आत्मविश्वास, नेतृत्व क्षमता और समाज में अपनी अलग पहचान बनाने का अवसर भी प्रदान किया। इसी दौरान उन्हें रूडसेट (RUDSET) संस्थान में सात दिवसीय प्रशिक्षण प्राप्त करने का अवसर मिला, जिसने उनके भीतर छिपी तकनीकी और प्रबंधन संबंधी क्षमताओं को नई दिशा दी।

प्रशिक्षण पूर्ण होने के बाद उन्होंने इंडियन बैंक के सहयोग से “बैंक सखी” के रूप में कार्य प्रारंभ किया। आज वे हैंडहेल्ड बायोमेट्रिक डिवाइस के माध्यम से ग्रामीणों तक बैंकिंग सेवाएँ उनके घर-घर पहुँचाकर डिजिटल वित्तीय समावेशन को साकार कर रही हैं। उनके प्रयासों से अनेक महिलाओं और ग्रामीण परिवारों को बैंक खाता खोलने, आधार आधारित बैंकिंग सेवाओं का लाभ लेने तथा सरकारी योजनाओं से जुड़ने में आसानी हो रही है।

प्रेमलता न केवल बैंकिंग सुविधाएँ उपलब्ध करा रही हैं, बल्कि प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना, प्रधानमंत्री जीवन ज्योति बीमा योजना और अटल पेंशन योजना जैसी महत्वपूर्ण सामाजिक सुरक्षा योजनाओं के प्रति भी लोगों को जागरूक कर उन्हें लाभान्वित कर रही हैं। पहले जिन छोटे-छोटे बैंकिंग कार्यों के लिए ग्रामीणों को कई किलोमीटर दूर बैंक शाखाओं के चक्कर लगाने पड़ते थे, अब वही सेवाएँ उनके गाँव में ही सहज रूप से उपलब्ध हो रही हैं। इससे समय, श्रम और धन—तीनों की बचत हो रही है।

आज बैंक सखी के रूप में प्रेमलता नरवरिया प्रतिमाह लगभग 15 से 20 हजार रुपये की सम्मानजनक आय अर्जित कर रही हैं। आर्थिक आत्मनिर्भरता ने उनके जीवन में नया आत्मविश्वास जगाया है और वे अपने परिवार की मजबूती के साथ-साथ पूरे क्षेत्र में वित्तीय साक्षरता और महिला सशक्तिकरण की सशक्त वाहक बन गई हैं।

प्रेमलता नरवरिया की यात्रा यह संदेश देती है कि यदि अवसर, सही मार्गदर्शन और दृढ़ संकल्प का साथ मिले तो ग्रामीण महिलाएँ भी विकास और परिवर्तन की अग्रदूत बन सकती हैं। उनकी सफलता इस बात का सजीव प्रमाण है कि स्वयं सहायता समूहों और कौशल विकास कार्यक्रमों के माध्यम से महिलाओं को न केवल आर्थिक रूप से सशक्त बनाया जा सकता है, बल्कि उन्हें समाज में नेतृत्वकारी भूमिका निभाने के लिए भी तैयार किया जा सकता है।

उनकी यह प्रेरक कहानी आज अनेक महिलाओं के लिए आशा, आत्मविश्वास और नए भारत के बदलते ग्रामीण परिदृश्य की जीवंत मिसाल बन चुकी है।