बालाघाट की धरती से निकली वैज्ञानिक सोच ने भोपाल विज्ञान मेले में बिखेरी चमक

भोपाल :

विज्ञान की उड़ान के लिए बड़े शहरों की प्रयोगशालाएं ही आवश्यक नहीं होतीं। यदि सोच में जिज्ञासा, समस्याओं को समझने की दृष्टि और समाधान खोजने का संकल्प हो, तो छोटे शहरों की धरती से भी ऐसे विचार जन्म ले सकते हैं, जो बड़े विज्ञान मंचों तक पहुंचते हैं।

13वें भोपाल विज्ञान मेले में बालाघाट से पहुंचे युवा नवप्रवर्तकों और शोधार्थियों के वैज्ञानिक प्रोजेक्ट इसी विश्वास को साकार करते दिखाई दे रहे हैं। कृषि, स्वास्थ्य, जल विश्लेषण और जैव प्रौद्योगिकी से जुड़े इन नवाचारों ने विद्यार्थियों, शोधार्थियों और दर्शकों के बीच विशेष आकर्षण पैदा किया है।

इन परियोजनाओं का मार्गदर्शन डॉ. दुर्गेश महंतराव अगासे कर रहे हैं, जबकि परियोजनाओं के विकास और आवश्यक व्यवस्थाओं में प्रो. पंकज कुशरे का भी महत्वपूर्ण सहयोग रहा है। इनके मार्गदर्शन में विद्यार्थियों ने स्थानीय समस्याओं को वैज्ञानिक दृष्टि से समझकर उनके संभावित समाधान खोजने का प्रयास किया है।

कृषि अपशिष्ट से मिट्टी के लिए उपयोगी संसाधन

भूमिप्लस टी-4 विकसित मृदा सुधारक के रूप में प्रस्तुत किया गया है। इसका उद्देश्य मिट्टी की उर्वरता, फसल वृद्धि और खेती की क्षमता को बढ़ावा देना है। इसमें केरा, बालाघाट स्थित सीके लैक्स इंडस्ट्रीज से प्राप्त लाख प्रसंस्करण अपशिष्ट का वैज्ञानिक उपयोग किया गया है। इसके निर्माण और विकास में मध्यप्रदेश विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद की तकनीकी सहायता भी मिली है।

औद्योगिक अपशिष्ट को उपयोगी कृषि संसाधन में बदलने की यह पहल पर्यावरण-अनुकूल कृषि की दिशा में महत्वपूर्ण सोच प्रस्तुत करती है।

स्वास्थ्य जांच में नई तकनीकी संभावना

स्वास्थ्य तकनीक के क्षेत्र में शुगर ब्रीथ 4.0 भी विशेष आकर्षण का केंद्र है। यह गैर-आक्रामक बहु-पैरामीटर स्वास्थ्य निगरानी उपकरण है, जिसमें उंगली में चुभन कर रक्त की बूंद से ग्लूकोज जांच करने के स्थान पर श्वास के नमूने के माध्यम से रक्त शर्करा के आकलन की दिशा में तकनीकी पहल की गई है।

इसमें रक्त में ऑक्सीजन की मात्रा, हृदय गति और नाड़ी गति जैसे स्वास्थ्य संबंधी मानकों की निगरानी को भी शामिल किया गया है। टीम लीडर हर्ष हितेंद्र तिवारी के नेतृत्व में विकसित यह नवाचार स्वास्थ्य तकनीक में नई संभावनाओं की ओर संकेत करता है। हालांकि ऐसी तकनीकों के वास्तविक चिकित्सकीय उपयोग के लिए व्यापक वैज्ञानिक और चिकित्सकीय परीक्षण आवश्यक होते हैं।

जल की गुणवत्ता जांचती वरुणयान

जल संरक्षण के क्षेत्र में वरुणयान इंटरनेट आधारित जल विश्लेषण नौका के रूप में प्रस्तुत की गई है। इसका उद्देश्य जल निकायों में तकनीक के माध्यम से जल गुणवत्ता का विश्लेषण करना है। जल स्रोतों की नियमित निगरानी आज पर्यावरण संरक्षण की महत्वपूर्ण आवश्यकता है। इस दृष्टि से यह परियोजना तकनीक और जल संरक्षण को जोड़ने का प्रयास है।

प्रकृति से समाधान खोजने की कोशिश

अरैक्नो हील परियोजना में मकड़ी के जाले से प्राप्त जैव सामग्री के संभावित उपयोग को रक्त का थक्का बनने की प्रक्रिया से जोड़ते हुए वैज्ञानिक अवधारणा प्रस्तुत की गई है। यह परियोजना इस बात का उदाहरण है कि प्रकृति में उपलब्ध सामान्य दिखाई देने वाली वस्तुओं में भी वैज्ञानिक संभावनाएं खोजी जा सकती हैं।

इन परियोजनाओं में डॉ. दुर्गेश महंतराव अगासे के मार्गदर्शन में हर्ष हितेंद्र तिवारी के साथ मुस्कान वैद्य, शीतल चौहान, स्वाति चौहान, तंजिला जहीन और माधवी बिसेन की सक्रिय भागीदारी है।

डॉ. दुर्गेश अगासे का ग्रामीण और छोटे शहरों के विद्यार्थियों को वैज्ञानिक गतिविधियों से जोड़ना महत्वपूर्ण है। किसी विद्यार्थी के भीतर प्रश्न पैदा करना, उसे सोचने के लिए प्रेरित करना और उस विचार को प्रयोग तथा नवाचार की दिशा देना ही वैज्ञानिक संस्कार की मजबूत नींव है।

लेखक का प्रणाम उन युवा मस्तिष्कों को, जो समस्याओं को केवल देखते नहीं, उनके समाधान खोजने का साहस भी करते हैं।