सूचना के अधिकार के तहत मांगी गई जानकारी उपलब्ध कराने में टालमटोल का आरोप, राज्य सूचना आयोग से निष्पक्ष जांच की मांग
भोपाल :
सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 के अंतर्गत नगर पालिक निगम, भोपाल से जल उपभोक्ता शुल्क (Water User Charge) एवं ठोस अपशिष्ट प्रबंधन शुल्क (Solid Waste Charge) से संबंधित महत्वपूर्ण जानकारी मांगने के बावजूद आवेदक को मूल अभिलेखों पर आधारित संपूर्ण, स्पष्ट एवं प्रमाणित जानकारी उपलब्ध नहीं कराई गई है। इस संबंध में अनिकेत द्विवेदी ने मध्य प्रदेश राज्य सूचना आयोग के समक्ष शिकायत प्रस्तुत कर संबंधित अधिकारियों की भूमिका की निष्पक्ष जांच तथा नियमानुसार जवाबदेही निर्धारित करने की मांग की है।
शिकायत के अनुसार, दिनांक 11 अगस्त 2026 को प्रस्तुत आरटीआई आवेदन में शुल्क वृद्धि, पूर्व एवं संशोधित दरों, शुल्क निर्धारण के कानूनी आधार, गणना प्रक्रिया, बकाया शुल्क पर अधिभार एवं ब्याज, सक्षम प्राधिकारी की स्वीकृति, संबंधित फाइल नोटिंग, आदेशों तथा अन्य प्रशासनिक अभिलेखों की प्रमाणित प्रतियां मांगी गई थीं।
आवेदन के संबंध में नगर निगम के लोक सूचना कार्यालय द्वारा पत्र क्रमांक 2158/लोकसूका/26, दिनांक 13 अगस्त 2026 के माध्यम से आवेदन को स्वच्छ भारत मिशन, जलकार्य विभाग तथा स्वास्थ्य विभाग को भेजा गया। हालांकि, शिकायतकर्ता का आरोप है कि संबंधित विभागों से प्राप्त उत्तरों में मांगे गए अभिलेखों की प्रमाणित प्रतियां उपलब्ध कराने के बजाय जानकारी को अन्य शाखाओं से संबंधित बताया गया अथवा कुछ बिंदुओं पर जानकारी निरंक बताई गई।
स्वास्थ्य विभाग द्वारा पत्र क्रमांक 325/स्वा.वि./2026 में आवेदन के बिंदु क्रमांक 1 से 7 तक की जानकारी को अपने कार्यालय से संबंधित नहीं बताते हुए निरंक बताया गया। वहीं, स्वच्छ भारत मिशन एवं जलकार्य विभाग के उत्तरों को लेकर भी शिकायतकर्ता ने आपत्ति जताई है। उनका कहना है कि केवल आवेदन को अन्य विभागों से संबंधित बताना पर्याप्त नहीं है; यह स्पष्ट होना चाहिए कि प्रत्येक बिंदु पर अभिलेख किस कार्यालय में उपलब्ध हैं, आवेदन किस अधिकारी को हस्तांतरित किया गया तथा मांगी गई जानकारी उपलब्ध कराने के लिए क्या कार्रवाई की गई।
अनिकेत द्विवेदी ने कहा कि नगर निगम द्वारा नागरिकों से वसूले जा रहे शुल्क की वैधानिकता, दरों में वृद्धि, गणना के आधार और प्रशासनिक स्वीकृतियों से संबंधित अभिलेख सार्वजनिक जवाबदेही के लिए महत्वपूर्ण हैं। ऐसे मामलों में नागरिकों को स्पष्ट और अभिलेख-आधारित जानकारी मिलना आवश्यक है।
शिकायत में राज्य सूचना आयोग से मांग की गई है कि—
1. मूल आरटीआई आवेदन तथा संबंधित विभागों के पत्राचार, नोटशीट, आदेशों और अन्य अभिलेखों की जांच कराई जाए।
2. यह निर्धारित किया जाए कि आवेदन के प्रत्येक बिंदु पर जानकारी उपलब्ध कराने के लिए कौन-सा लोक सूचना अधिकारी उत्तरदायी था।
3. सूचना का अधिकार अधिनियम की धारा 6(3) के अंतर्गत आवेदन के हस्तांतरण की वैधानिक प्रक्रिया का पालन हुआ या नहीं, इसकी जांच की जाए।
4. यह परीक्षण किया जाए कि धारा 5(4) के अंतर्गत अन्य अधिकारियों की सहायता ली गई या नहीं तथा जानकारी उपलब्ध कराने के लिए उचित प्रयास किए गए या नहीं।
5. यदि जांच में धारा 20(1) के अंतर्गत दंड के लिए निर्धारित परिस्थितियां प्रमाणित होती हैं, तो संबंधित लोक सूचना अधिकारी को सुनवाई का अवसर देकर नियमानुसार कार्रवाई की जाए।
6. आवश्यकतानुसार अधिनियम के प्रावधानों के तहत शेष जानकारी एवं उपलब्ध अभिलेखों की प्रमाणित प्रतियां उपलब्ध कराने के निर्देश दिए जाएं।
शिकायतकर्ता ने स्पष्ट किया कि उनका उद्देश्य किसी अधिकारी को बिना जांच दोषी ठहराना नहीं, बल्कि पूरे प्रकरण की अभिलेख-आधारित जांच कराना, सूचना के अधिकार का प्रभावी क्रियान्वयन सुनिश्चित करना तथा नगर निगम की शुल्क वसूली व्यवस्था में पारदर्शिता और जवाबदेही स्थापित करना है।
अनिकेत द्विवेदी ने राज्य सूचना आयोग से आग्रह किया है कि मामले को केवल विभागीय पत्राचार तक सीमित न रखते हुए संबंधित अभिलेखों की जांच के आधार पर निष्पक्ष निर्णय लिया जाए और जहां उल्लंघन प्रमाणित हो, वहां कानून के अनुसार कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।
