वाल्मीकि रामायण विश्व का पहला काव्य ग्रंथ, जिसने सनातन धर्म की परिभाषा दी – रघुनंदन शर्मा

भोपाल:

संस्कार भारती मध्यभारत प्रांत साहित्य विभाग, तुलसी मानस प्रतिष्ठान एवं पं. रामकिंकर पुस्तकालय एवं शोध केंद्र के संयुक्त तत्वावधान में सोमवार को महर्षि वाल्मीकि जयंती के अवसर पर संगोष्ठी का आयोजन किया गया। मानस भवन, श्यामला हिल्स में आयोजित संगोष्ठी का विषय ‘रामकथा और महर्षि वाल्मीकि की सार्वकालिकता’ रहा। कार्यक्रम में विचारक एवं चिंतक डॉ. प्रभुदयाल मिश्र मुख्य वक्ता के रूप में शामिल हुए, जबकि अध्यक्षता तुलसी मानस प्रतिष्ठान के कार्याध्यक्ष एवं पूर्व राज्यसभा सांसद रघुनंदन शर्मा ने की। इस अवसर पर आरजीपीवी के कुलपति आलोक शर्मा सहित बड़ी संख्या में साहित्य, कला एवं संस्कृति प्रेमी उपस्थित रहे। कार्यक्रम में विषय प्रवेश संस्कार भारती मध्यभारत प्रांत साहित्य विभाग संयोजक रंजना चितले ने किया। कार्यक्रम का संचालन दीपिका पुरोहित ने किया। रंजना चितले ने प्रारंभ में महर्षि वाल्मीकि के व्यक्तित्व एवं कृतित्व का स्मरण करते हुए रामायण की भारतीय संस्कृति में महत्ता पर प्रकाश डाला।

वाल्मीकि यथार्थवादी कवि हैं
मुख्य वक्ता डॉ. प्रभुदयाल मिश्र ने कहा कि महर्षि वाल्मीकि ने 24 हजार श्लोकों में रामायण की रचना की। उनका साहित्य केवल कथा का वर्णन नहीं, बल्कि जीवन के यथार्थ, मानवीय व्यवहार और सनातन मूल्यों का गहन विवेचन है। वाल्मीकि जी यथार्थवादी कवि हैं। उन्होंने जीवन को जिस दृष्टि से देखा और प्रस्तुत किया, उसमें मानवीय स्वभाव, परिस्थितियों और कर्तव्यबोध का वास्तविक चित्रण मिलता है। डॉ. मिश्र ने कहा कि कृतज्ञता सनातन परंपरा का सबसे बड़ा पक्ष है। अपने प्रति किए गए उपकारों को स्मरण रखना और उनके प्रति सम्मान व्यक्त करना भारतीय संस्कृति की महत्वपूर्ण विशेषता है। महर्षि वाल्मीकि ने अपने साहित्य के माध्यम से सनातन धर्म के मूल स्वरूप और उसके जीवन मूल्यों को समझने का मार्ग प्रशस्त किया। रामायण के प्रसंग आज भी समाज को कर्तव्य, मर्यादा, त्याग और मानवीय संवेदनाओं की प्रेरणा देते हैं। उन्होंने कहा कि महर्षि वाल्मीकि का योगदान भारतीय साहित्य तक सीमित नहीं है, बल्कि उनकी रामायण विश्व साहित्य की अमूल्य धरोहर है।

वाल्मीकि का नाम विश्वभर में सम्मान से लिया जाता है
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए रघुनंदन शर्मा ने कहा कि महर्षि वाल्मीकि ऐसा नाम है, जिसे भारत ही नहीं, अनेक देशों में सम्मान के साथ जाना जाता है। विश्व में जब महान कवियों की चर्चा होती है, तब महर्षि वाल्मीकि का नाम प्रमुखता से सामने आता है। वाल्मीकि रामायण विश्व का पहला काव्य ग्रंथ है, जिसने भारतीय साहित्य और सांस्कृतिक चेतना को दिशा प्रदान की। उन्होंने महर्षि वाल्मीकि के जीवन प्रसंग का उल्लेख करते हुए कहा कि रत्नाकर का प्रारंभिक जीवन संघर्षपूर्ण था। वे परिवार के भरण-पोषण के लिए परिश्रम करते थे। जीवन में सप्तऋषियों से भेंट उनके लिए परिवर्तनकारी सिद्ध हुई। सप्तऋषियों ने उन्हें अपने सामर्थ्य के अनुसार कर्म करने, प्रभु श्रीराम का नाम स्मरण करने और ज्ञान की दिशा में आगे बढ़ने की प्रेरणा दी। इसके बाद रत्नाकर ने राम नाम का स्मरण प्रारंभ किया और साधना के माध्यम से महर्षि वाल्मीकि के रूप में प्रतिष्ठित हुए। शर्मा ने कहा कि महर्षि वाल्मीकि के जीवन से यह प्रेरणा मिलती है कि साधना, ज्ञान और आत्मचिंतन से व्यक्ति अपने जीवन को नई दिशा दे सकता है। उन्होंने साहित्य के क्षेत्र में महर्षि वाल्मीकि की छवि को लेकर वैचारिक मतभेदों का उल्लेख करते हुए कहा कि किसी भी विषय पर विचार व्यक्ति अपने अनुभव और ज्ञान के आधार पर रखता है। इसलिए महर्षि वाल्मीकि के व्यक्तित्व और कृतित्व का मूल्यांकन उनके मूल साहित्य और भारतीय परंपरा के संदर्भ में किया जाना चाहिए।

भाषण प्रतियोगिता का भी आयोजन
संगोष्ठी से पूर्व महर्षि वाल्मीकि के जीवन पर केंद्रित भाषण प्रतियोगिता आयोजित की गई। इसमें प्रतिभागियों ने उनके जीवन, साहित्यिक योगदान और रामायण के सांस्कृतिक महत्व पर विचार व्यक्त किए।